॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
धनुष लिए खड़े अर्जुन — एक ओर परकोटे वाले नगर के ऊपर तेज सूर्य, दूसरी ओर सूखे वृक्ष के ऊपर काली वर्षा, और वर्षा में सिर झुकाए बैठी ओढ़नी ओढ़े एक आकृति

02गीता की शिक्षाएँ · स्थितप्रज्ञ

स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि

सुख-दुःख, लाभ-हानि में अविचल।

शिक्षा

स्थितप्रज्ञ

नीचे 5 श्लोक: संस्कृत, उच्चारण, दोनों भाषाओं में ट्रस्ट का अनुवाद, और यह श्लोक यहाँ क्यों है — इस पर ट्रस्ट की टिप्पणी।

समता — सुख और दुःख में समान

दूसरे अध्याय के अंत में अर्जुन एक सीधा प्रश्न पूछते हैं: स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति वास्तव में कैसा होता है? वह कैसे बैठता, चलता, बोलता है? श्रीकृष्ण का उत्तर गीता का परिपक्व मनुष्य का चित्र है — स्थितप्रज्ञ।

ऐसा व्यक्ति भावशून्य नहीं होता। वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख अनुभव करता है, पर उनमें बह नहीं जाता। कामनाएँ उसमें वैसे ही प्रवेश करती हैं जैसे नदियाँ समुद्र में, जो भरा हुआ और स्थिर बना रहता है। उसकी शांति घटनाओं के मौसम पर निर्भर नहीं करती।

तीन आकृतियाँ: प्रकाश-मंडल में बैठी (सत्त्व), बढ़ती और प्रहार करती (रज), घुटने पर सिर रखे झुकी (तम)
सत्त्व, रज और तम — तीन प्रकार के मनुष्य नहीं, बल्कि तीन अवस्थाएँ जिनमें हर मनुष्य आता-जाता है।

भवन हर मौसम में एक-सा रहने का प्रयास करता है — आरती उसी समय, द्वार उसी तरह खुले — ताकि जो भी आए, उसे अस्थिर सप्ताह में एक स्थिर स्थान मिले।

भवन में

श्लोक

गीता के अपने शब्दों में।

भगवद्गीता 2.14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ / āgamāpāyino’nityāstāṁstitikṣasva bhārata

श्रीभगवान्

वे आते-जाते हैं; उन्हें सहो।

हे कौंतेय, विषयों का स्पर्श ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है। वे आते हैं और चले जाते हैं, टिकते नहीं। हे भारत, उन्हें सह लो।

English · Kaunteya, contact with things brings cold and heat, pleasure and pain. They come and they go. They do not last. Bear them, Bharata.

ट्रस्ट का पाठ · संसार के संपर्क से सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख आते हैं। वे आते हैं और चले जाते हैं; वे स्थायी नहीं हैं। हे अर्जुन, उन्हें सहन करो।

पूरे अध्याय में 2.14 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.15

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

yaṁ hi na vyathayantyete puruṣaṁ puruṣarṣabha / samaduḥkhasukhaṁ dhīraṁ so’mṛtatvāya kalpate

श्रीभगवान्

जिसे ये विचलित नहीं करते, वह अमरत्व का अधिकारी है।

हे पुरुषश्रेष्ठ, जिस धीर पुरुष को ये विचलित नहीं करते, जो सुख और दुःख में एक समान है, वही अमृतत्व के योग्य होता है।

English · Best of men, the one whom these do not trouble — steady, the same in pain and in pleasure — he is fit for what does not die.

ट्रस्ट का पाठ · जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं करते, जो दुःख और सुख में समान रहता है, वह अमरत्व के योग्य हो जाता है।

पूरे अध्याय में 2.15 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ / vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate

श्रीभगवान्

दुःख में अविचलित, सुख में निःस्पृह।

जो दुःख में विचलित नहीं होता, सुख में जिसकी चाह नहीं रहती, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है — वही स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहा जाता है।

English · Untroubled in sorrow, without craving in happiness, free of longing, fear and anger — such a person is called a sage of steady understanding.

ट्रस्ट का पाठ · जिसका मन दुःखों से उद्विग्न नहीं होता, जिसे सुखों की लालसा नहीं, जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है — वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।

पूरे अध्याय में 2.56 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.57

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham / nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā

श्रीभगवान्

न शुभ से हर्षित, न अशुभ से द्वेष।

जो सर्वत्र आसक्ति से रहित है, जो शुभ पाकर हर्षित नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।

English · The one who is unattached everywhere, who neither rejoices at what is pleasant nor recoils from what is not when it comes to him — his understanding is firmly set.

ट्रस्ट का पाठ · जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जो शुभ पाकर हर्षित नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी बुद्धि स्थिर है।

पूरे अध्याय में 2.57 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṁ / samudramāpaḥ praviśanti yadvat / tadvatkāmā yaṁ praviśanti sarve / sa śāntimāpnoti na kāmakāmī

श्रीभगवान्

जैसे नदियाँ समुद्र में।

जैसे भरे हुए और अचल समुद्र में सब जल आकर समा जाते हैं, वैसे ही सब कामनाएँ जिसमें समा जाती हैं, वही शांति पाता है — वह नहीं, जो कामनाएँ करता ही रहता है।

English · As waters enter the sea, which is filled and yet unmoved, so all desires enter the one who reaches peace — not the one who goes on wanting.

ट्रस्ट का पाठ · जैसे नदियाँ भरे हुए, अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही कामनाएँ स्थिर व्यक्ति में प्रवेश करती हैं और उसे विचलित नहीं करतीं। वही शांति पाता है — कामनाओं के पीछे भागने वाला नहीं।

पूरे अध्याय में 2.70 पढ़ें →

सामान्य प्रश्न

इस शिक्षा के विषय में।

स्थितप्रज्ञ किसे कहते हैं?

शाब्दिक अर्थ है “जिसकी प्रज्ञा स्थिर है”। 2.54 में अर्जुन ऐसे व्यक्ति के लक्षण पूछते हैं, और श्रीकृष्ण अध्याय के अंत तक उत्तर देते हैं (2.55–72): दुःख में अविचलित, सुख में निःस्पृह, भय और क्रोध से मुक्त, इंद्रियाँ वश में, और शांत — क्योंकि उसकी शांति परिणामों पर निर्भर नहीं है।

क्या समता का अर्थ उदासीनता है?

नहीं। स्थितप्रज्ञ सब कुछ अनुभव करता है पर उससे शासित नहीं होता। गीता उसकी तुलना समुद्र से करती है: नदियाँ बहती रहती हैं, और समुद्र भरा और स्थिर बना रहता है।

सभी नौ विषय अठारह अध्याय