॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
रथ के आगे लगाम थामे खड़े श्रीकृष्ण और पीछे हथेली पर सिर टिकाए बैठे अर्जुन, आगे चार श्वेत अश्व, और नीचे उतरते सूर्य के नीचे मैदान पर आमने-सामने खड़ी दोनों सेनाएँ

01गीता की शिक्षाएँ · कर्मयोग

कर्मयोग — निष्काम कर्म

जो कर्तव्य सामने है, उसे पूरा करो; फल की चिंता छोड़ दो।

शिक्षा

कर्मयोग

नीचे 5 श्लोक: संस्कृत, उच्चारण, दोनों भाषाओं में ट्रस्ट का अनुवाद, और यह श्लोक यहाँ क्यों है — इस पर ट्रस्ट की टिप्पणी।

कर्मयोग — निष्काम कर्म

गीता की पहली और सबसे व्यावहारिक शिक्षा कर्म के बारे में है। अर्जुन अपने कर्तव्य से हट जाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें उसके परिणाम का भय है। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि भय गलत है; वे बताते हैं कि उसका भार कहाँ उतारना है। तुम्हारा अधिकार केवल अपने प्रयास पर है, उसके फल पर कभी नहीं। जो तुम्हारा कर्तव्य है उसे पूरी तरह करो, और फल छोड़ दो।

यह उदासीनता नहीं है। कर्मयोग कम नहीं, अधिक प्रयास माँगता है — ऐसा प्रयास जो पुरस्कार या दोष की चिंता से विषाक्त न हो। गीता कहती है कि ऐसा कर्म करने वाले को शुद्ध करता है, और जो इस प्रकार कर्म करता है वह “परम को प्राप्त होता है”।

बाण छोड़ता धनुर्धर, और कर्म से फल, फल से आसक्ति, आसक्ति से पुनः कर्म का चक्र
कर्म, फल, आसक्ति, फिर कर्म। कर्मयोग इस चक्र को केवल एक स्थान पर काटता है — आसक्ति पर, कर्म पर कभी नहीं।

भवन की हर सेवा — दर्शन, सत्संग, उद्यान, अतिथि-गृह — बिना शुल्क और बिना अपेक्षा के दी जाती है। विलेख ऐसा करने को नहीं कहता; ट्रस्ट ने इसे कभी और ढंग से किया ही नहीं।

भवन में

श्लोक

गीता के अपने शब्दों में।

भगवद्गीता 2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana / mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo’stvakarmaṇi

श्रीभगवान्

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं।

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, उसके फलों में कभी नहीं। फल को कर्म का कारण मत बनाओ, और अकर्म में भी आसक्त मत हो।

English · Your right is to the action alone, never to its fruits. Do not let the fruit be your reason for acting, and do not be attached to inaction either.

ट्रस्ट का पाठ · फल को कर्म का कारण मत बनाओ — और फल खोने के भय से अकर्मण्य भी मत बनो। निष्ठा से काम करो; परिणाम छोड़ दो।

पूरे अध्याय में 2.47 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya / siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga ucyate

श्रीभगवान्

समता ही योग कहलाती है।

हे धनंजय, योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर कर्म करो — सिद्धि और असिद्धि में समान रहकर। यही समता योग कहलाती है।

English · Do your work standing in yoga, Dhananjaya, letting attachment go, the same whether it succeeds or fails. That evenness is what yoga means.

ट्रस्ट का पाठ · आसक्ति छोड़कर, योग में स्थित होकर कर्म करो, सिद्धि और असिद्धि में समान रहो। संसार से पलायन नहीं, संतुलन — यही गीता का योग है।

पूरे अध्याय में 2.48 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte / tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam

श्रीभगवान्

योग कर्मों में कुशलता है।

इस बुद्धि से युक्त पुरुष इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों को छोड़ देता है। इसलिए योग में लगो। कर्मों में कुशलता ही योग है।

English · One joined to this understanding leaves behind both good deeds and bad, here in this life. So take up yoga. Yoga is skill in action.

ट्रस्ट का पाठ · जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह यहीं पुण्य और पाप दोनों से मुक्त हो जाता है। इसलिए योग में लगो: कर्म की सच्ची कुशलता उसे बिना बँधे करने में है।

पूरे अध्याय में 2.50 पढ़ें →
भगवद्गीता 3.8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ / śarīrayātrāpi ca te na prasiddhyedakarmaṇaḥ

श्रीभगवान्

अपना नियत कर्म करो; अकर्म से कर्म श्रेष्ठ है।

तुम अपने नियत कर्म को करो, क्योंकि कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है। कर्म के बिना तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी न हो सकेगा।

English · Do the work that is laid down for you, for action is better than inaction. Without action you could not even keep your own body going.

ट्रस्ट का पाठ · त्याग का अर्थ कुछ न करना नहीं है। कर्म के बिना तो शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता। जो कर्म तुम्हारा है, उसे करो।

पूरे अध्याय में 3.8 पढ़ें →
भगवद्गीता 3.19

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

tasmādasaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samācara / asakto hyācarankarma paramāpnoti pūruṣaḥ

श्रीभगवान्

अनासक्त होकर कर्म करने वाला परम को प्राप्त होता है।

इसलिए आसक्ति छोड़कर सदा वही कर्म करो जो करना चाहिए। आसक्ति के बिना कर्म करता हुआ मनुष्य परम पद को प्राप्त कर लेता है।

English · So do the work that must be done, always, without attachment. Acting without attachment, a person reaches what is highest.

ट्रस्ट का पाठ · इसलिए सदा अनासक्त होकर कर्तव्य कर्म करो। काम छोड़ने से नहीं, बिना चिपके काम करने से मनुष्य सर्वोच्च को पाता है।

पूरे अध्याय में 3.19 पढ़ें →

सामान्य प्रश्न

इस शिक्षा के विषय में।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते” का क्या अर्थ है?

यह गीता 2.47 का आरंभ है: “तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं।” श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे अपना कर्तव्य भली-भाँति करने पर पूरा ध्यान दें और फल की लालसा तथा भय से कर्म छोड़ने की प्रवृत्ति — दोनों को त्याग दें।

क्या कर्मयोग का अर्थ परिणाम की परवाह न करना है?

नहीं। इसका अर्थ है परिणाम को काम करने का कारण न बनाना, और उसकी चिंता से काम को कमज़ोर न होने देना। योजना और लक्ष्य फिर भी रहते हैं; बस अपनी शांति को परिणाम से नहीं बाँधते।

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