॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
धूल में घुटनों पर बैठे अर्जुन, पास रखा धनुष, और उनके ऊपर हाथ बढ़ाए खड़े श्रीकृष्ण, पीछे पंक्तिबद्ध सेना के ऊपर डूबता सूर्य

04गीता की शिक्षाएँ · भक्ति

भक्ति

पत्र, पुष्प, फल, जल — प्रेम से अर्पित, स्वीकार है।

शिक्षा

भक्ति

नीचे 5 श्लोक: संस्कृत, उच्चारण, दोनों भाषाओं में ट्रस्ट का अनुवाद, और यह श्लोक यहाँ क्यों है — इस पर ट्रस्ट की टिप्पणी।

भक्तियोग — प्रेम ही मार्ग

गीता भक्ति का द्वार सबके लिए खोलती है। वह धन, विद्या या पद नहीं माँगती — केवल सच्चाई। पत्र, पुष्प, फल, थोड़ा जल, प्रेम से अर्पित, स्वीकार होता है। और जो कुछ तुम करते, खाते, देते या सहते हो, वही अर्पण बन सकता है।

गीता में भक्ति कोई आती-जाती भावना नहीं है। वह वह दिशा है जिसमें पूरा जीवन मुड़ा होता है। भक्त से श्रीकृष्ण का वचन आश्चर्यजनक रूप से व्यक्तिगत है: “जो उनके पास नहीं है वह मैं देता हूँ और जो है उसकी रक्षा करता हूँ।” ग्रंथ का अंत भी इसी स्वर में है — शरण में आओ, और शोक मत करो।

मंदिर के द्वार सबके लिए खुले हैं, और भोग-प्रसाद बिना भेद के बाँटा जाता है। श्रीकृष्ण के सामने सायं आरती से भवन का दिन 18.66 के भाव में समाप्त होता है।

भवन में

श्लोक

गीता के अपने शब्दों में।

भगवद्गीता 9.26

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

patraṁ puṣpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayacchati / tadahaṁ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ

श्रीभगवान्

पत्र, पुष्प, फल, जल।

पत्ता, फूल, फल या जल — जो कोई भी मुझे भक्ति से अर्पित करता है, उस शुद्ध हृदय वाले का प्रेम से लाया हुआ वह अर्पण मैं स्वीकार करता हूँ।

English · A leaf, a flower, a fruit, water — whoever offers me this with devotion, I accept what is brought, offered in love by someone whose heart is clean.

ट्रस्ट का पाठ · जो कोई भक्ति से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है — शुद्ध हृदय से प्रेमपूर्वक दिया वह अर्पण मैं स्वीकार करता हूँ।

पूरे अध्याय में 9.26 पढ़ें →
भगवद्गीता 9.27

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

yatkaroṣi yadaśnāsi yajjuhoṣi dadāsi yat / yattapasyasi kaunteya tatkuruṣva madarpaṇam

श्रीभगवान्

जो कुछ करो, उसे अर्पण बना दो।

तुम जो भी करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और जो तप करते हो — हे कौन्तेय, वह सब मुझे अर्पित करके करो।

English · Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in the fire, whatever you give away, whatever discipline you take on — do it, Kaunteya, as an offering to me.

ट्रस्ट का पाठ · जो कुछ करते हो, जो खाते हो, जो हवन या दान करते हो, जो तप करते हो — वह सब मुझे अर्पण करो।

पूरे अध्याय में 9.27 पढ़ें →
भगवद्गीता 9.22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

ananyāścintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate / teṣāṁ nityābhiyuktānāṁ yogakṣemaṁ vahāmyaham

श्रीभगवान्

उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।

जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हैं और मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य जुड़े हुए भक्तों का योग और क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

English · For those who think of me and of no one else, who wait on me in worship, always steady in that union, I carry what they lack and guard what they hold.

ट्रस्ट का पाठ · जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य युक्त भक्तों का योग और क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

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भगवद्गीता 12.8

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥

mayyeva mana ādhatsva mayi buddhiṁ niveśaya / nivasiṣyasi mayyeva ata ūrdhvaṁ na saṁśayaḥ

श्रीभगवान्

मन मुझमें लगाओ।

अपना मन मुझमें ही लगाओ और अपनी बुद्धि को मुझमें स्थिर करो। इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं।

English · Fix your mind on me alone and let your understanding rest in me. From then on you will live in me — of this there is no doubt.

ट्रस्ट का पाठ · अपना मन मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि मुझमें स्थापित करो; तब तुम इसके बाद मुझमें ही निवास करोगे। इसमें कोई संशय नहीं।

पूरे अध्याय में 12.8 पढ़ें →
भगवद्गीता 18.66

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

sarvadharmānparityajya māmekaṁ śaraṇaṁ vraja / ahaṁ tvāṁ sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ

श्रीभगवान्

मेरी शरण में आओ। शोक मत करो।

सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

English · Letting go of all duties, come to Me alone for shelter. I shall set you free from every sin; do not grieve.

ट्रस्ट का पाठ · गीता का अंतिम आश्वासन: सब सहारों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा। शोक मत करो।

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सामान्य प्रश्न

इस शिक्षा के विषय में।

गीता में भक्तियोग क्या है?

भक्ति का मार्ग — मन, हृदय और कर्मों को ईश्वर की ओर मोड़ना। बारहवाँ अध्याय इसका और भक्त के स्वभाव का वर्णन करता है; नौवाँ अध्याय कहता है कि यह सबके लिए खुला है और केवल सच्चाई माँगता है।

“सर्वधर्मान्परित्यज्य” का क्या अर्थ है?

गीता 18.66: “सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो।” इसे गीता का अंतिम वचन माना जाता है: सारी शिक्षा के बाद, समर्पण और विश्वास।

सभी नौ विषय अठारह अध्याय