॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
चित्र के एक ओर रात्रि-आकाश के सामने पत्रहीन काला वृक्ष, और दूसरी ओर रथ पर से प्रकाश बिखेरते श्रीकृष्ण

गीता की शिक्षाएँ

नौ विषय, और वे श्लोक जिन पर वे टिके हैं।

गीता साधारण कठिनाइयों से बात करती है। ये पृष्ठ उसे विषय-दर-विषय लेते हैं, और श्लोकों को स्वयं बोलने देते हैं।

नौ विषय

कर्मयोग — निष्काम कर्म

कर्मयोग

कर्मयोग — निष्काम कर्म

जो कर्तव्य सामने है, उसे पूरा करो; फल की चिंता छोड़ दो।

5 श्लोक →
समता — सुख और दुःख में समान

स्थितप्रज्ञ

स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि

सुख-दुःख, लाभ-हानि में अविचल।

5 श्लोक →
कर्म का साहस — उठो और जो उचित है वह करो

स्वधर्म

स्वधर्म — अपना कर्तव्य

अपना धर्म, अपूर्ण रूप से किया गया भी, दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है।

5 श्लोक →
भक्तियोग — प्रेम ही मार्ग

भक्ति

भक्ति

पत्र, पुष्प, फल, जल — प्रेम से अर्पित, स्वीकार है।

5 श्लोक →
ज्ञानयोग — सत्य का दर्शन

ज्ञान

ज्ञान — आत्मज्ञान

आत्मा न जन्मती है, न मरती है।

5 श्लोक →
धर्म — उचित प्रसंग में उचित कर्म

धर्म

धर्म

जब-जब धर्म की हानि होती है, ईश्वर उसे पुनः स्थापित करते हैं।

5 श्लोक →
मन का संयम — स्थिर रथ

ध्यान

ध्यान — मन का संयम

स्वयं को स्वयं से ऊपर उठाओ; मन को मित्र बनाओ।

5 श्लोक →
सब प्राणियों में ईश्वर — एक सत्ता, अनेक रूप

समदर्शन

समदर्शन — करुणा और समभाव

किसी प्राणी से द्वेष नहीं; सबके प्रति मैत्री और करुणा।

5 श्लोक →
लोकसंग्रह — सबके कल्याण के लिए

दान

दान — सही ढंग से देना

जो दान कर्तव्य समझकर, बिना प्रतिफल की आशा के दिया जाए।

5 श्लोक →

जीवन के लिए गीता

उन प्रश्नों के लिए ज्ञान जिनका हम वास्तव में सामना करते हैं।

जब मुझे असफलता का भय हो

गीता 2.48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

गीता महत्वाकांक्षा छोड़ने या परिणाम की चिंता बंद करने को नहीं कहती। वह इतना कहती है कि अपनी भीतरी स्थिरता उनके हाथ मत सौंपो। उत्कृष्टता का प्रयत्न करो, उत्तरदायित्व लो, और सफलता तथा असफलता — दोनों में स्थिर रहो।

जब परिणाम मुझ पर हावी हो जाए

गीता 2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

निष्काम कर्म न उदासीनता है, न अकर्म। इसका अर्थ है सामने के कर्तव्य को अपनी पूरी निष्ठा देना, और फल की आसक्ति को अपने भीतर पर शासन न करने देना।

जब इच्छा क्रोध बन जाए

गीता 2.62–63

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

श्रीकृष्ण एक भीतरी क्रम दिखाते हैं: विषयों का चिंतन आसक्ति बनता है; आसक्ति कामना को पालती है; कामना से क्रोध उपजता है; और क्रोध विवेक को ढक देता है। उत्तेजना, तुलना और तत्काल तृप्ति के इस युग में यह कठोर आत्म-मनोविज्ञान है।

जब मेरा मन चंचल हो

गीता 6.35

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

गीता मन को वश में करने की कठिनाई से इनकार नहीं करती। श्रीकृष्ण एक साधन देते हैं: अभ्यास, बार-बार का प्रयत्न, और वैराग्य, बाध्य कर देने वाली आसक्ति से मुक्ति। आत्म-संयम साधा जाता है, चाहने भर से नहीं आता।

जब सही मार्ग स्पष्ट न हो

संसार बार-बार पूछता है, “मुझे क्या चाहिए?” गीता उससे गहरा प्रश्न पूछती है: “यहाँ मेरा धर्म क्या है?” धर्म हमें सुविधा से हटाकर उत्तरदायित्व की ओर मोड़ता है — परिवार, कार्य, समाज और नैतिक व्यवस्था के प्रति।

जब सफलता मुझे प्रभाव दे

गीता 3.21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

प्रभाव जितना बड़ा, उत्तरदायित्व उतना बड़ा। नेतृत्व केवल अधिकार नहीं, उदाहरण का अनुशासन है।

भक्ति मेरे भीतर क्या बदले?

गीता 12.13

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

शास्त्र-ज्ञान, कर्मकांड और मंदिर की उपासना — तीनों एक भीतरी कसौटी माँगते हैं: क्या ज्ञान ने मुझे विनम्र किया? क्या भक्ति ने मुझे अधिक करुण बनाया? क्या साधना ने क्रोध और अहंकार को घटाया? क्या श्रीकृष्ण की निकटता ने बदला कि मैं दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता हूँ?

सामान्य प्रश्न

शिक्षाओं के विषय में।

भगवद्गीता की मुख्य शिक्षाएँ क्या हैं?

फल की आसक्ति के बिना निष्ठा से कर्म करो (कर्मयोग); सिद्धि-असिद्धि में समान रहो; अपना धर्म निभाओ; जानो कि आत्मा न जन्मती है न मरती है; सबके लिए खुली भक्ति को अपनाओ; धर्म पर टिके रहो, जिसकी पुनः स्थापना के लिए ईश्वर युग-युग में प्रकट होते हैं; अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करो; करुणा और निरहंकार से जियो; और सही ढंग से दान करो।

निष्काम कर्म क्या है?

फल की कामना के बिना किया गया कर्म। यह न उदासीनता है न अकर्म — इसका अर्थ है सामने के कर्तव्य को पूरी निष्ठा देना, पर परिणाम की आसक्ति को अपने भीतर पर शासन न करने देना। गीता 2.47 में यही कहा गया है: कर्म में तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं।

ये शिक्षाएँ आज के कार्य और गृहस्थ जीवन पर कैसे लागू होती हैं?

गीता उस गृहस्थ से कही गई है जो अपने कर्तव्य से भाग नहीं सकता। इस पृष्ठ का हर विषय इसी पर समाप्त होता है कि साधारण दिन में उसका क्या अर्थ है — महत्वाकांक्षा को बिना उसमें डूबे कैसे रखें, मन को कैसे स्थिर करें, अहंकार के बिना सेवा कैसे करें, और जब दो कर्तव्य टकराएँ तब क्या करें।

क्या ट्रस्ट ये शिक्षाएँ प्रत्यक्ष रूप से देता है?

हाँ। हांसी गीता भवन में नियमित सत्संग, गीता-पाठ और प्रवचन होते हैं, और पुस्तकालय व अध्ययन-कक्ष खुले हैं। सबका स्वागत है, और कोई शुल्क नहीं है।