॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
एक अग्नि के ऊपर खुला हाथ किए श्रीकृष्ण, जिसमें शृंखलाएँ और टूटे शस्त्र भस्म हो रहे हैं, और बैठे हुए देखते अर्जुन

05गीता की शिक्षाएँ · ज्ञान

ज्ञान — आत्मज्ञान

आत्मा न जन्मती है, न मरती है।

शिक्षा

ज्ञान

नीचे 5 श्लोक: संस्कृत, उच्चारण, दोनों भाषाओं में ट्रस्ट का अनुवाद, और यह श्लोक यहाँ क्यों है — इस पर ट्रस्ट की टिप्पणी।

ज्ञानयोग — सत्य का दर्शन

अर्जुन को क्या करना है, यह बताने से पहले श्रीकृष्ण उन्हें बताते हैं कि वे क्या हैं। शरीर जन्म लेता है, बूढ़ा होता है और मरता है; उसमें रहने वाला नहीं। शस्त्र उसे काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता। ज्ञानी न जीवितों के लिए शोक करते हैं, न मृतकों के लिए।

यह गीता की नींव है। कर्मयोग, स्थिरता, भक्ति — सब इसी पर टिके हैं। यदि तुम जो वास्तव में हो उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकती, तो भय की पकड़ ढीली पड़ जाती है, और तुम मुक्त हाथ से कर्म कर सकते हो। गीता इस ज्ञान को संसार की सबसे पवित्र वस्तु कहती है, और कहती है कि सच्चा साधक समय के साथ इसे स्वयं में पा लेता है।

क्षेत्र नाम से अंकित एक बड़ी बैठी आकृति, जिसके भीतर क्षेत्रज्ञ नाम से अंकित छोटी आकृति
एक चित्र में तेरहवाँ अध्याय: शरीर क्षेत्र है, और उसके भीतर जो जानता है वह क्षेत्रज्ञ।

गर्भगृह में माँ सरस्वती श्रीकृष्ण के साथ विराजमान हैं, और विलेख पुस्तकालय और अध्ययन-कक्ष माँगता है। ट्रस्ट ज्ञान को पूजा का ही एक रूप मानता है, कोई अलग विभाग नहीं।

भवन में

श्लोक

गीता के अपने शब्दों में।

भगवद्गीता 2.20

न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

na jāyate mriyate vā kadācin / nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ / ajo nityaḥ śāśvato’yaṁ purāṇo / na hanyate hanyamāne śarīre

श्रीभगवान्

शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मरती।

यह न जन्मता है, न कभी मरता है। एक बार होकर यह फिर न होने वाला नहीं। अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन — शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।

English · It is not born, and it never dies. Having been, it does not cease to be. Unborn, everlasting, enduring, ancient — it is not killed when the body is killed.

ट्रस्ट का पाठ · आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है; होकर फिर न होने वाली नहीं है। अजन्मा, नित्य, शाश्वत, पुरातन — शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मरती।

पूरे अध्याय में 2.20 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

vāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya / navāni gṛhṇāti naro’parāṇi / tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā / nyanyāni saṁyāti navāni dehī

श्रीभगवान्

जैसे पुराने वस्त्र बदलकर नए।

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए पहन लेता है, वैसे ही देही जीर्ण शरीरों को छोड़कर दूसरे नए शरीरों में चला जाता है।

English · As a man puts aside worn-out clothes and takes up new ones, so the one who dwells in the body puts aside worn-out bodies and enters others that are new.

ट्रस्ट का पाठ · जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही देही जीर्ण शरीरों को छोड़कर नए शरीरों में प्रवेश करता है।

पूरे अध्याय में 2.22 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

nainaṁ chindanti śastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ / na cainaṁ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ

श्रीभगवान्

शस्त्र इसे काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती।

इसे शस्त्र नहीं काटते, अग्नि नहीं जलाती, जल नहीं भिगोता, और वायु नहीं सुखाती।

English · Weapons do not cut it. Fire does not burn it. Water does not wet it. Wind does not dry it.

ट्रस्ट का पाठ · इसे शस्त्र नहीं काटते, अग्नि नहीं जलाती, जल नहीं भिगोता, वायु नहीं सुखाती।

पूरे अध्याय में 2.23 पढ़ें →
भगवद्गीता 4.38

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥

na hi jñānena sadṛśaṁ pavitramiha vidyate / tatsvayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati

श्रीभगवान्

ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं।

इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। जो योग में सिद्ध हो चुका है, वह समय आने पर उसे अपने भीतर ही पा लेता है।

English · There is nothing in this world as purifying as knowledge. The one who has ripened in yoga finds it within himself, in his own time.

ट्रस्ट का पाठ · इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं है। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय आने पर उसे स्वयं अपने भीतर पा लेता है।

पूरे अध्याय में 4.38 पढ़ें →
भगवद्गीता 4.34

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā / upadekṣyanti te jñānaṁ jñāninastattvadarśinaḥ

श्रीभगवान्

प्रणाम, प्रश्न और सेवा से इसे जानो।

इसे प्रणाम करके, प्रश्न पूछकर और सेवा के द्वारा जानो। जो ज्ञानी हैं और तत्त्व को देखते हैं, वे तुम्हें वह ज्ञान सिखाएँगे।

English · Learn this by bowing down, by asking questions, and by service. Those who know, who see things as they are, will teach that knowledge to you.

ट्रस्ट का पाठ · तत्त्व को जानने वाले ज्ञानियों के पास जाकर — प्रणाम से, जिज्ञासा भरे प्रश्नों से, और सेवा से — उस ज्ञान को जानो। वे तुम्हें उपदेश देंगे।

पूरे अध्याय में 4.34 पढ़ें →

सामान्य प्रश्न

इस शिक्षा के विषय में।

गीता आत्मा के बारे में क्या कहती है?

कि आत्मा अजन्मा, नित्य और अविनाशी है (2.20–25)। शरीर बदलता और मरता है; आत्मा नहीं। इसीलिए गीता अर्जुन से कहती है कि ज्ञानी शोक नहीं करते।

गीता के अनुसार ज्ञान कैसे मिलता है?

गीता 4.34: तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास विनम्रता, सच्ची जिज्ञासा और सेवा के साथ जाकर। ज्ञान एक संबंध में मिलता है, केवल पुस्तक से नहीं।

सभी नौ विषय अठारह अध्याय