॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
शांत जलधारा के बीच खिले कमल पर बैठी आकृति, हृदय में ज्योति, किनारों पर चलते एक बालक, एक युवक, गठरी लिए एक पथिक और एक वृद्ध, और आगे बैठे देखते श्रीकृष्ण तथा अर्जुन

07गीता की शिक्षाएँ · ध्यान

ध्यान — मन का संयम

स्वयं को स्वयं से ऊपर उठाओ; मन को मित्र बनाओ।

शिक्षा

ध्यान

नीचे 5 श्लोक: संस्कृत, उच्चारण, दोनों भाषाओं में ट्रस्ट का अनुवाद, और यह श्लोक यहाँ क्यों है — इस पर ट्रस्ट की टिप्पणी।

मन का संयम — स्थिर रथ

छठा अध्याय मन के लिए गीता की पुस्तिका है। यह एक कठोर और एक कोमल सत्य से आरंभ होता है: तुम्हारा आंतरिक कार्य कोई और तुम्हारे लिए नहीं कर सकता, और कोई तुम्हें उसे करने से रोक भी नहीं सकता। आत्मा अपनी मित्र भी है और अपनी शत्रु भी, इस पर निर्भर कि उसे वश में किया गया है या नहीं।

विधि कोई विचित्र नहीं है। भोजन और निद्रा, कार्य और विश्राम में संयम। स्थिर आसन, स्थिर दृष्टि, और जब-जब मन भटके, उसे लौटा लाना। अर्जुन कहते हैं कि मन को पकड़ना वायु को पकड़ने जैसा कठिन है; श्रीकृष्ण सहमत होते हैं, और दो उपाय देते हैं जो काम करते हैं: अभ्यास और वैराग्य।

रथ, मनुष्य के प्रतीक रूप में: ध्वजा आत्मा, रथी बुद्धि, लगाम मन, अश्व इंद्रियाँ, और रथ स्वयं शरीर।
यह चित्र गीता का अपना नहीं है — इंद्रियों को अश्व और बुद्धि को सारथि कहना कठोपनिषद् का है, और जिस पाठक के मन में यह पहले से है, उसे गीता का अपना क्रम समझने में सहायता मिलेगी। गीता इंद्रियों को मन से नीचे, मन को बुद्धि से नीचे और आत्मा को तीनों से ऊपर रखती है (3.42); इंद्रियों के मनुष्य को भटका देने का उसका अपना चित्र जल पर वायु से बहती नाव है (2.67)।

परिसर का योग केंद्र इसी अध्याय के लिए है। गीता के अर्थ में योग मन की वह स्थिरता है जो पूरे दिन साथ चलती है, केवल आसन पर किया गया अभ्यास नहीं।

भवन में

श्लोक

गीता के अपने शब्दों में।

भगवद्गीता 6.5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

uddharedātmanātmānaṁ nātmānamavasādayet / ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ

श्रीभगवान्

स्वयं को स्वयं से ऊपर उठाओ।

अपने आप को अपने ही बल से ऊपर उठाओ, अपने आप को गिरने मत दो। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

English · Lift yourself by your own effort; do not let yourself sink. You are your own friend, and you are your own enemy.

ट्रस्ट का पाठ · अपने द्वारा अपना उद्धार करो; स्वयं को गिरने मत दो। क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है, और आत्मा ही आत्मा का शत्रु।

पूरे अध्याय में 6.5 पढ़ें →
भगवद्गीता 6.6

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ / anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat

श्रीभगवान्

जीता हुआ मन मित्र है; न जीता हुआ, शत्रु।

जिसने अपने ही प्रयत्न से स्वयं को जीत लिया, उसके लिए वह स्वयं ही मित्र है। जिसने नहीं जीता, उसके लिए वह स्वयं ही शत्रु की तरह खड़ा रहता है।

English · For the man who has mastered himself by himself, he himself is his friend. For the man who has not, he stands against himself like an enemy.

ट्रस्ट का पाठ · जिसने मन को जीत लिया है, उसके लिए मन परम मित्र है। जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही शत्रु की तरह व्यवहार करता है।

पूरे अध्याय में 6.6 पढ़ें →
भगवद्गीता 6.16–17

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

nātyaśnatastu yogo’sti na caikāntamanaśnataḥ / na cātisvapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu / yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā

श्रीभगवान्

आहार, विश्राम और कर्म में संयम।

अर्जुन, योग न उसका होता है जो बहुत खाता है, न उसका जो बिलकुल नहीं खाता; न उसका जो बहुत सोता है, न उसका जो जागता ही रहता है। जो खाने और घूमने-फिरने में संतुलित है, काम में अपना श्रम संतुलित रखता है, और सोने-जागने में संतुलित है, उसके लिए योग दुख का अंत बन जाता है।

English · Yoga is not for the man who eats too much, Arjuna, nor for the man who does not eat at all; not for one who sleeps too much, nor for one who stays awake. For the man who is measured in eating and in rest, measured in the effort he puts into work, measured in sleep and waking, yoga becomes the end of sorrow.

ट्रस्ट का पाठ · योग न बहुत खाने वाले का होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का, न सदा जागने वाले का। जिसका आहार-विहार, कर्मों में चेष्टा, और सोना-जागना संयमित है, उसका योग दुःखों का नाश करता है।

पूरे अध्याय में 6.16–17 पढ़ें →
भगवद्गीता 6.35

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

asaṁśayaṁ mahābāho mano durnigrahaṁ calam / abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate

श्रीभगवान्

अभ्यास और वैराग्य से मन वश में होता है।

इसमें कोई संदेह नहीं, अर्जुन, कि मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। पर हे कौन्तेय, अभ्यास से और वैराग्य से वह वश में आ जाता है।

English · There is no doubt, Arjuna, that the mind is restless and hard to hold. But by steady practice, Kaunteya, and by letting go of wanting, it is brought under control.

ट्रस्ट का पाठ · हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। परंतु अभ्यास और वैराग्य से, हे कौन्तेय, उसे वश में किया जा सकता है।

पूरे अध्याय में 6.35 पढ़ें →
भगवद्गीता 2.62–63

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

dhyāyato viṣayānpuṁsaḥ saṅgasteṣūpajāyate / saṅgātsañjāyate kāmaḥ kāmātkrodho’bhijāyate

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

krodhādbhavati sammohaḥ sammohātsmṛtivibhramaḥ / smṛtibhraṁśādbuddhināśo buddhināśātpraṇaśyati

श्रीभगवान्

चिंतन से विनाश तक की शृंखला।

विषयों का चिंतन करते रहने से मनुष्य को उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है, और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मोह होता है, मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति के नष्ट होने पर बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य नष्ट हो जाता है।

English · Dwelling on things, a man grows attached to them. From attachment desire is born. From desire comes anger. From anger comes confusion. From confusion, memory fails. When memory fails, understanding is lost, and when understanding is lost, the man is lost.

ट्रस्ट का पाठ · विषयों का चिंतन करने से उनमें आसक्ति होती है; आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध। क्रोध से मोह, मोह से स्मृति का भ्रम, स्मृति-भ्रंश से बुद्धि का नाश, और बुद्धि-नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है। शृंखला को पहली कड़ी पर ही तोड़ो।

पूरे अध्याय में 2.62–63 पढ़ें →

सामान्य प्रश्न

इस शिक्षा के विषय में।

गीता के अनुसार मन को कैसे वश में करें?

गीता 6.35: अभ्यास और वैराग्य से। छठा अध्याय आहार, निद्रा और कर्म में संयम, स्थिर आसन, और मन के भटकने पर उसे धैर्य से बार-बार लौटा लाने (6.26) का भी निर्देश देता है।

गीता में “क्रोध की शृंखला” क्या है?

गीता 2.62–63 बताती है कि विषय का चिंतन कैसे आसक्ति, कामना, क्रोध, मोह, स्मृति-भ्रम, बुद्धि-नाश और अंततः विनाश तक ले जाता है। व्यावहारिक सीख है: इस प्रक्रिया को शुरू में ही पहचानो और तोड़ो।

सभी नौ विषय अठारह अध्याय