
अध्याय 2 · आत्मा का ज्ञान
भगवद्गीता 2.57
न शुभ से हर्षित, न अशुभ से द्वेष।
श्रीभगवान्
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham / nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā
जो सर्वत्र आसक्ति से रहित है, जो शुभ पाकर हर्षित नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।
English · The one who is unattached everywhere, who neither rejoices at what is pleasant nor recoils from what is not when it comes to him — his understanding is firmly set.
अर्थ
न शुभ से हर्षित, न अशुभ से द्वेष।
जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जो शुभ पाकर हर्षित नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी बुद्धि स्थिर है।
यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।
यह श्लोक कहाँ खड़ा है
स्थितप्रज्ञ
अध्याय 22.54–72
अर्जुन पूछते हैं कि स्थिर प्रज्ञा जीवन में कैसी दिखती है; काम, क्रोध, इंद्रियाँ और शांति परखे जाते हैं।
यह श्लोक प्रसंग के मध्य विकास में आता है।
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 2.57 का अर्थ क्या है?
न शुभ से हर्षित, न अशुभ से द्वेष। जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जो शुभ पाकर हर्षित नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी बुद्धि स्थिर है।
भगवद्गीता 2.57 कौन बोलता है?
श्रीभगवान्। वक्ता पाठ की अपनी उवाच पंक्ति से लिया गया है, श्लोक-क्रमांक से अनुमानित नहीं।
