॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा

अध्याय 2 · आत्मा का ज्ञान
भगवद्गीता 2.57
न शुभ से हर्षित, न अशुभ से द्वेष।
श्रीभगवान्
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham / nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā
जो सर्वत्र आसक्ति से रहित है, जो शुभ पाकर हर्षित नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।
English · The one who is unattached everywhere, who neither rejoices at what is pleasant nor recoils from what is not when it comes to him — his understanding is firmly set.
अर्थ
न शुभ से हर्षित, न अशुभ से द्वेष।
जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जो शुभ पाकर हर्षित नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी बुद्धि स्थिर है।
यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।
