॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
सूर्योदय के समय कुरुक्षेत्र में रथ पर विराजमान श्रीकृष्ण, हाथ उठाए अर्जुन से कहते हुए, और सुनते हुए बैठे अर्जुन

शब्दावली · ध्यान

ध्यान

ध्यान — मन को एकत्र कर एक ही वस्तु पर टिकाना।

भगवद्गीता ध्यान करने की विधि क्या बताती है?

ध्यान का अर्थ है मन को एकत्र करके एक ही वस्तु पर टिकाना। छठा अध्याय इसकी विधि सीधे-सीधे बताता है, और वह विधि साधारण है: स्वच्छ स्थान, स्थिर आसन जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, शरीर-सिर-गर्दन एक सीध में, दृष्टि स्थिर, इंद्रियाँ शांत। फिर दो शर्तें आती हैं, जिनकी अधिकांश पाठक अपेक्षा नहीं करते। योग न उसका होता है जो बहुत खाता है, न उसका जो कुछ नहीं खाता; न बहुत सोने वाले का, न सदा जागने वाले का। और मन जहाँ-जहाँ भटके, उसे वहीं से लौटा लाना है।

हांसी गीता भवन ट्रस्ट · ध्यान 5 श्लोकों में

पाठ में

ध्यान

dhyāna

5 श्लोकपहला 2.62

कोई श्लोक तब गिना गया है जब उसके संस्कृत पाठ में वह शब्द आता है, समास सहित। यह जाँचने योग्य तथ्य है और न्यूनतम है, कुल नहीं — गीता वहाँ भी यही सिखाती है जहाँ यह शब्द नहीं आता।

6.11 से 6.14 तक के निर्देश शारीरिक हैं, और उनमें कुछ भी विचित्र नहीं। स्वच्छ स्थान चुनो। ऐसा आसन बनाओ जो हिले नहीं, न ऊँचा हो न नीचा, जिस पर कुश, मृगचर्म और वस्त्र एक के ऊपर एक बिछे हों। बैठो। शरीर, सिर और गर्दन एक सीध में स्थिर रखो। दृष्टि को कमरे में घूमने देने के बजाय, नासिका के अग्रभाग पर टिकाओ। भीतर से शांत रहो, निर्भय रहो, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थिर रहो, और चित्त श्रीकृष्ण पर टिका रहने दो। ग्रंथ इसमें कोई सजावट नहीं करता, और यह वचन भी नहीं देता कि यह सब सुखद लगेगा।

फिर वह श्लोक आता है जिस पर पाठक सबसे अधिक चौंकते हैं। योग न उसका होता है जो बहुत खाता है, न उसका जो बिलकुल नहीं खाता; न उसका जो बहुत सोता है, न उसका जो जागता ही रहता है। अगला श्लोक वही बात दूसरी ओर से कहता है: आहार और विश्राम में संतुलित, कर्म में लगाए गए श्रम में संतुलित, सोने-जागने में संतुलित — ऐसे व्यक्ति के लिए योग दुःख का अंत बन जाता है। यहाँ भोग जितनी दृढ़ता से मना किया गया है, उतनी ही दृढ़ता से कठोर तपस्या भी। स्वयं को भूखा रखकर बनाई गई साधना इस अध्याय की माँग नहीं है।

अध्याय यह मानकर चलता है कि आरंभ में असफलता होगी। 6.25 धैर्य से थामी हुई बुद्धि के सहारे धीरे-धीरे शांत होने को कहता है, और फिर कहता है कि कुछ भी न सोचे। 6.26 शेष बात खुलकर कहता है: यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटक जाए, वहीं से उसे रोककर फिर आत्मा के वश में ले आओ। जहाँ-जहाँ, और फिर से — श्लोक उसी मन के लिए लिखा गया है जो बार-बार जाता है। जब अर्जुन कहते हैं कि यह हवा को रोकने जैसा है, तो श्रीकृष्ण सहमत होते हैं और दो उपाय देते हैं: अभ्यास, और वैराग्य। कहीं यह संकेत नहीं है कि ये शीघ्र काम करते हैं।

अध्याय जो चित्र छोड़ जाता है वह है वायुरहित स्थान में रखा दीपक, जो काँपता नहीं। उसे विधि का नहीं, परिणाम का वर्णन मानकर पढ़ना ठीक बैठता है। और गीता ध्यान को अपनी ही सूची में सबसे ऊपर नहीं रखती: 12.12 अभ्यास से ज्ञान को, ज्ञान से ध्यान को, और ध्यान से कर्मफल के त्याग को श्रेष्ठ कहता है, और कहता है कि ऐसे त्याग से शांति तुरंत मिलती है। छठा अध्याय मन की पुस्तिका है, पूरा ग्रंथ नहीं।

इसका अर्थ यह नहीं है

ध्यान का अर्थ है विचार का रुक जाना, इसलिए जिसका मन बार-बार भटकता है वह असफल है।

अध्याय कहता तो है कि मन को आत्मा में स्थिर करके कुछ भी न सोचे (6.25), पर उसके ठीक अगला श्लोक मान लेता है कि मन भटकेगा, और केवल इतना कहता है कि वह जहाँ भी जाए, वहीं से उसे लौटा लाओ (6.26)। जब अर्जुन कहते हैं कि मन को रोकना हवा को रोकने जितना कठिन है, तो श्रीकृष्ण सहमत होते हैं और बात को हल्का नहीं करते (6.34 और 6.35)। भटकना यहाँ साधना की सामान्य स्थिति है, साधक के विरुद्ध प्रमाण नहीं।

गीता के अपने शब्दों में

जिन श्लोकों पर यह आधारित है।

संस्कृत और दोनों अनुवाद मूल पाठ हैं। प्रत्येक श्लोक के नीचे की टिप्पणी ट्रस्ट का कारण है कि वह श्लोक यहाँ क्यों है — टिप्पणी से असहमत होकर भी श्लोक पर भरोसा किया जा सकता है।

  1. भगवद्गीता 6.10श्रीभगवान्

    योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
    एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥

    योगी को चाहिए कि वह एकांत में रहकर, अकेले, मन और शरीर को वश में रखते हुए, बिना किसी आशा और बिना संग्रह के, निरंतर अपने आप को साधे।

    आसन से पहले की शर्तें: एकांत, अकेलापन, मन और शरीर का संयम, कोई आशा नहीं और कोई संग्रह नहीं।

  2. भगवद्गीता 6.11श्रीभगवान्

    शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
    नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥

    स्वच्छ जगह पर वह अपने लिए स्थिर आसन लगाए — न बहुत ऊँचा, न बहुत नीचा — जिस पर कुश, मृगचर्म और वस्त्र एक के ऊपर एक बिछे हों।

    आसन स्वयं। स्वच्छ स्थान, स्थिर आसन जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, और उस पर कुश, मृगचर्म तथा वस्त्र एक के ऊपर एक। गीता यहाँ अक्षरशः बोल रही है।

  3. भगवद्गीता 6.13श्रीभगवान्

    समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
    सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥

    वह शरीर, सिर और गर्दन को एक सीध में स्थिर रखे, हिले नहीं, अपनी नाक के अगले भाग पर दृष्टि टिकाए और इधर-उधर न देखे।

    शरीर, सिर और गर्दन एक सीध में और स्थिर; दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर टिकी हुई, इधर-उधर नहीं।

  4. भगवद्गीता 6.16श्रीभगवान्

    नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
    न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

    अर्जुन, योग न उसका होता है जो बहुत खाता है, न उसका जो बिलकुल नहीं खाता; न उसका जो बहुत सोता है, न उसका जो जागता ही रहता है।

    वह श्लोक जिस पर पाठक चौंकते हैं। योग न बहुत खाने वाले का है, न बिलकुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का, न सदा जागते रहने वाले का।

  5. भगवद्गीता 6.17श्रीभगवान्

    युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

    जो खाने और घूमने-फिरने में संतुलित है, काम में अपना श्रम संतुलित रखता है, और सोने-जागने में संतुलित है, उसके लिए योग दुख का अंत बन जाता है।

    वही नियम सकारात्मक रूप में, और कर्म तथा जागरण तक फैलाया हुआ। श्लोक कहता है कि संयमित व्यक्ति के लिए योग दुःख का अंत बन जाता है।

  6. भगवद्गीता 6.26श्रीभगवान्

    यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
    ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

    यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटक जाए, वहीं से उसे रोककर वह फिर से आत्मा के वश में ले आए।

    बैठने पर वास्तव में जो होता है, उसका निर्देश। मन जहाँ भी गया हो, वहीं से उसे लौटा लाओ। श्लोक मानता है कि वह जाएगा, और बार-बार जाएगा।

  7. भगवद्गीता 6.19श्रीभगवान्

    यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
    योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

    जैसे हवा रहित जगह में रखा दीपक नहीं काँपता, वैसी ही उपमा उस योगी के लिए कही गई है जो मन को साधे हुए आत्मा का योग करता है।

    वायुरहित स्थान में रखा दीपक, जो काँपता नहीं। स्थिर हो चुके मन के लिए अध्याय की एकमात्र उपमा।

व्यवहार में

जब कोई इसे जीता है, तब कैसा दिखता है।

नौ बजे दुकान बंद करके सोने से पहले दस मिनट बैठने वाला दुकानदार वही कर रहा है जो 6.11 बताता है, मृगचर्म के बिना। श्लोक में महत्त्व इस बात का है कि आसन उसका अपना हो, हर बार वही स्थान हो, और वह डगमगाए नहीं। अध्याय पूरा एक श्लोक बैठने की व्यवस्था पर खर्च करता है, क्योंकि असुविधा में पड़ा शरीर मन को रुक जाने के कारण देता रहेगा।

6.16 वह निर्देश है जिसे अधिकांश लोग छोड़ जाते हैं, और वही आज रात से माना जा सकता है। जिस विद्यार्थी ने सुबह से कुछ खाया नहीं और चार घंटे सोया है, उसका ध्यान कहीं नहीं टिकेगा, और गीता यह बात विधि कहने से पहले कहती है। समय पर भोजन, समय पर नींद, और किसी घंटे पर रुक जाने वाला काम — ये साधना की तैयारी भर नहीं हैं। श्लोक इन्हें साधना का अंग बनाता है।

भटकना समस्या नहीं है। रात की पाली से लौटी नर्स को, पाँच मिनट में बीस बार, अपना मन वार्ड की ओर लौटता मिलेगा। 6.26 के पास इसके लिए एक ही निर्देश है, और बीसवीं बार भी वही है जो पहली बार था: देखो वह कहाँ गया, और उसे लौटा लाओ। इन लौटानों को असफलता गिनना वही भूल है जिसे रोकने के लिए यह श्लोक लिखा जान पड़ता है।

ध्यान पर ट्रस्ट का लेखन →

साथ चलने वाले शब्द

सामान्य प्रश्न

ध्यान के विषय में।

गीता के अनुसार कितनी देर ध्यान करना चाहिए?

ग्रंथ यह नहीं बताता। छठा अध्याय स्थान, आसन, मुद्रा, दृष्टि की दिशा और मन के हिलने पर क्या करना है, यह सब देता है, पर न कोई अवधि बताता है और न दिन का कोई पहर। जहाँ गीता मौन है, वहाँ कहीं और से कोई संख्या लाकर उस पर गीता का नाम लगाने से बेहतर है यह कह देना कि वह मौन है।

गीता आहार और निद्रा के बारे में क्या कहती है?

6.16 दोनों छोर हटा देता है: बहुत भोजन और बिलकुल भोजन नहीं, बहुत नींद और बिलकुल नींद नहीं। 6.17 उसमें कर्म और जागरण भी जोड़ देता है, और कहता है कि इन सबमें संयमित व्यक्ति के लिए, योग दुःख का अंत बन जाता है। कथन विशिष्ट है। इस अध्याय में आहार और विश्राम साधना की तैयारी नहीं, साधना की शर्तें हैं।

क्या कुश के आसन पर ही बैठना ज़रूरी है?

6.11 कुश, मृगचर्म और वस्त्र का नाम लेता ही है, स्वच्छ भूमि पर एक के ऊपर एक बिछे हुए। पर वह यह भी बताता है कि यह व्यवस्था किसलिए है: ऐसा आसन जो स्थिर हो और जिसकी ऊँचाई मध्यम हो। गीता उसी श्लोक में अपने समय की सामग्री और उसके पीछे का कारण, दोनों देती है, और आगे चलने वाला हिस्सा कारण है।

क्या गीता में ध्यान सबसे ऊँची साधना है?

ग्रंथ के अपने क्रम से नहीं। 12.12 अभ्यास से ज्ञान को, ज्ञान से ध्यान को, और ध्यान से कर्मफल के त्याग को ऊपर रखता है, और कहता है कि ऐसे त्याग से शांति तुरंत मिलती है। बैठकर की जाने वाली साधना का सबसे विस्तृत वर्णन छठे अध्याय में है, पर ग्रंथ उसे अपनी ही सूची में शीर्ष पर नहीं रखता।

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