॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
सूर्योदय में अर्जुन फिर धनुष उठाते, पास लगाम थामे श्रीकृष्ण

अध्याय 18 · मोक्ष और संन्यास

भगवद्गीता 18.46

अपने कर्म से ही पूजा।

श्रीभगवान्

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

yataḥ pravṛttirbhūtānāṁ yena sarvamidaṁ tatam / svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṁ vindati mānavaḥ

जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह संपूर्ण जगत् व्याप्त है, उसी की अपने कर्म के द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।

English · He from whom all beings arise and by whom all this is pervaded — worshipping Him through one’s own work, a person finds perfection.

अर्थ

अपने कर्म से ही पूजा।

जिससे सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं और जिससे यह सब व्याप्त है, उसकी अपने कर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।

यह श्लोक कहाँ खड़ा है

स्वभाव और स्वधर्म

अध्याय 1818.40–48

समाज में स्थित कर्तव्य और स्वभाव के अनुसार कर्म की चर्चा; अपूर्णता अपने कर्म को अपने आप अमान्य नहीं कर देती।

यह श्लोक प्रसंग के मध्य विकास में आता है।

ट्रस्ट का विषयस्वधर्म

जो मेरा करने योग्य है, क्या मैं उसे सबसे सरल, सबसे प्रशंसित या सबसे लाभकारी के साथ मिला रहा हूँ?

इसे इसके सूत्र के साथ पढ़िए: 2.31–38 · 3.35 · 18.41–48

किन विषयों में

इस श्लोक के शब्द

ये इसलिए दिए गए हैं कि ऊपर के संस्कृत में वह शब्द आता है — यह जाँचने योग्य तथ्य है, व्याख्या नहीं।

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 18.46 का अर्थ क्या है?

अपने कर्म से ही पूजा। जिससे सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं और जिससे यह सब व्याप्त है, उसकी अपने कर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

भगवद्गीता 18.46 कौन बोलता है?

श्रीभगवान्। वक्ता पाठ की अपनी उवाच पंक्ति से लिया गया है, श्लोक-क्रमांक से अनुमानित नहीं।

पूरा अध्याय 18 पढ़ें सभी 700 श्लोक