॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा

अध्याय 18 · मोक्ष और संन्यास
भगवद्गीता 18.46
अपने कर्म से ही पूजा।
श्रीभगवान्
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
yataḥ pravṛttirbhūtānāṁ yena sarvamidaṁ tatam / svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṁ vindati mānavaḥ
जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उसी की अपने कर्म के द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।
English · He from whom all beings arise and by whom all this is pervaded — worshipping Him through one's own work, a person finds perfection.
अर्थ
अपने कर्म से ही पूजा।
जिससे सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं और जिससे यह सब व्याप्त है, उसकी अपने कर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।
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