॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
सूर्योदय में अर्जुन फिर धनुष उठाते, पास लगाम थामे श्रीकृष्ण

अध्याय 18 · मोक्ष और संन्यास

भगवद्गीता 18.48

जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है।

श्रीभगवान्

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

sahajaṁ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet / sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ

हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी दोष से वैसे ही ढके रहते हैं जैसे अग्नि धुएँ से।

English · One should not give up the work born with him, O son of Kunti, even when it carries some flaw; for every undertaking is wrapped in a flaw, as fire is wrapped in smoke.

अर्थ

जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है।

अपने स्वाभाविक कर्म को दोषयुक्त होने पर भी मत छोड़ो। हर कार्य किसी न किसी दोष से ढका रहता है, जैसे अग्नि धुएँ से।

यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।

किन विषयों में

इस श्लोक के शब्द

ये इसलिए दिए गए हैं कि ऊपर के संस्कृत में वह शब्द आता है — यह जाँचने योग्य तथ्य है, व्याख्या नहीं।

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