॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
सूर्योदय में अर्जुन फिर धनुष उठाते, पास लगाम थामे श्रीकृष्ण

अध्याय 18 · मोक्ष और संन्यास

भगवद्गीता 18.66

मेरी शरण में आओ। शोक मत करो।

श्रीभगवान्

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

sarvadharmānparityajya māmekaṁ śaraṇaṁ vraja / ahaṁ tvāṁ sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ

सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

English · Letting go of all duties, come to Me alone for shelter. I shall set you free from every sin; do not grieve.

अर्थ

मेरी शरण में आओ। शोक मत करो।

गीता का अंतिम आश्वासन: सब सहारों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा। शोक मत करो।

यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।

यह श्लोक कहाँ खड़ा है

विचार, प्रेम और शरणागति

अध्याय 1818.63–66

श्रीकृष्ण पहले विचार करने की स्वतंत्रता देते हैं, फिर भक्ति और शरण की अंतरंग परिणति आती है।

यह श्लोक प्रसंग को पूरा करता है और अगले मोड़ की भूमिका बनाता है।

ट्रस्ट का विषयशरणागति

भगवान् की शरण मेरे उत्तरदायित्व उठाने के ढंग में क्या बदल देगी?

इसे इसके सूत्र के साथ पढ़िए: 2.7 · 7.14 · 9.22 · 12.6–7 · 18.62 · 18.66 · 18.73

शरण में परिणति

श्लोक अर्जुन से श्रीकृष्ण की शरण लेने को कहता है और पाप से मुक्ति का वचन देता है। इसका अर्थ “सारा उत्तरदायित्व छोड़ दो” या “अपने ही भरोसे रहो” नहीं है।

और गहराई में · 7.14, 9.18, 12.6–7, 18.56–62 और 18.63–73 के साथ पढ़िए।

हांसी गीता भवन ट्रस्ट · द गीता फ़ॉर लाइफ़

किन विषयों में

इस श्लोक के शब्द

ये इसलिए दिए गए हैं कि ऊपर के संस्कृत में वह शब्द आता है — यह जाँचने योग्य तथ्य है, व्याख्या नहीं।

समान शब्दावली वाले श्लोक

पाठ के अपने शब्दों में इसके निकट।

  1. 16.5दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है और आसुरी बंधन की ओर, ऐसा माना गया है। हे पांडव, शोक मत करो। तुम दैवी संपदा लेकर ही जन्मे हो।
  2. 1.47रणभूमि में ऐसा कहकर अर्जुन बाण सहित धनुष त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया; उसका मन शोक से व्याकुल था।
  3. 17.9कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले आहार राजसी व्यक्ति को प्रिय होते हैं। ये दुःख, शोक और रोग देते हैं।
  4. 18.27जो रागी है, कर्मफल चाहता है, लोभी, हिंसक और अशुद्ध है, तथा हर्ष और शोक से घिरा रहता है — वह कर्ता राजस कहा गया है।
  5. 18.28जो अयुक्त, गँवार, अकड़ू, कपटी, दूसरों का काम बिगाड़ने वाला, आलसी, विषादग्रस्त और काम को टालने वाला है — वह कर्ता तामस कहा जाता है।
  6. 18.35जिस धृति से दुर्बुद्धि मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता — हे पार्थ! वह धृति तामसी है।

समान दुर्लभ शब्दों के आधार पर चुने गए, जहाँ दुर्लभ शब्द का भार सामान्य शब्द से कहीं अधिक है। यह पढ़ने में सहायक है, यह दावा नहीं कि इन श्लोकों का अर्थ एक है।

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 18.66 का अर्थ क्या है?

मेरी शरण में आओ। शोक मत करो। गीता का अंतिम आश्वासन: सब सहारों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा। शोक मत करो।

भगवद्गीता 18.66 कौन बोलता है?

श्रीभगवान्। वक्ता पाठ की अपनी उवाच पंक्ति से लिया गया है, श्लोक-क्रमांक से अनुमानित नहीं।

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