॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
धूल में घुटनों पर बैठे अर्जुन, पास रखा धनुष, और उनके ऊपर हाथ बढ़ाए खड़े श्रीकृष्ण, पीछे पंक्तिबद्ध सेना के ऊपर डूबता सूर्य

अध्याय 12 · भक्ति का योग

भगवद्गीता 12.13

द्वेष-रहित; मित्रवत और करुणामय।

श्रीभगवान्

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva ca / nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī

वह किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से मुक्त है, सुख-दुःख में समान है, और क्षमाशील है।

English · He bears no ill will towards any living being, is friendly and kind to all, free of the sense of mine and of pride, the same in pain and pleasure, and forgiving.

अर्थ

द्वेष-रहित; मित्रवत और करुणामय।

जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, जो मित्रवत और करुणामय है, ममता और अहंकार से रहित, सुख-दुःख में समान, और क्षमाशील है —

यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।

यह श्लोक कहाँ खड़ा है

प्रिय भक्त के लक्षण

अध्याय 1212.13–20

अद्वेष, मैत्री, करुणा, समता, संयम और अनुद्वेग — भक्ति इन्हीं में देह धरती है।

यह श्लोक इस प्रसंग का आरंभ करता है।

ट्रस्ट का विषयचरित्र

मेरा बार-बार दोहराया जाने वाला आचरण कौन-सा गुण गढ़ रहा है?

इसे इसके सूत्र के साथ पढ़िए: 12.13–20 · 13.7–11 · 16.1–3 · 17.14–16 · 18.42–44

भक्ति चरित्र बनती है

अद्वेष, मैत्री और करुणा से उस भक्त का लंबा वर्णन आरंभ होता है जो श्रीकृष्ण को प्रिय है। भक्ति की परीक्षा इसलिए स्वभाव में होती है, केवल पूजा के भाव में नहीं।

और गहराई में · 12.13–20 को क्रम से पढ़िए, फिर 16.1–3 और 17.14–16 से तुलना कीजिए।

हांसी गीता भवन ट्रस्ट · द गीता फ़ॉर लाइफ़

किन विषयों में

इस श्लोक के शब्द

ये इसलिए दिए गए हैं कि ऊपर के संस्कृत में वह शब्द आता है — यह जाँचने योग्य तथ्य है, व्याख्या नहीं।

समान शब्दावली वाले श्लोक

पाठ के अपने शब्दों में इसके निकट।

  1. 13.8इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, अहंकार का अभाव, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे तथा रोग में जो दुःख और दोष है, उसे बार-बार स्पष्ट देखते रहना;
  2. 2.14हे कौंतेय, विषयों का स्पर्श ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है। वे आते हैं और चले जाते हैं, टिकते नहीं। हे भारत, उन्हें सह लो।
  3. 2.15हे पुरुषश्रेष्ठ, जिस धीर पुरुष को ये विचलित नहीं करते, जो सुख और दुःख में एक समान है, वही अमृतत्व के योग्य होता है।
  4. 2.38सुख और दुःख को, लाभ और हानि को, जय और पराजय को एक समान मानकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
  5. 2.56जो दुःख में विचलित नहीं होता, सुख में जिसकी चाह नहीं रहती, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है — वही स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहा जाता है।
  6. 6.7जिसने स्वयं को जीत लिया और जो शांत है, उसमें परमात्मा स्थिर रहता है — सर्दी और गर्मी में, सुख और दुख में, मान और अपमान में, सब में एक समान।

समान दुर्लभ शब्दों के आधार पर चुने गए, जहाँ दुर्लभ शब्द का भार सामान्य शब्द से कहीं अधिक है। यह पढ़ने में सहायक है, यह दावा नहीं कि इन श्लोकों का अर्थ एक है।

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 12.13 का अर्थ क्या है?

द्वेष-रहित; मित्रवत और करुणामय। जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, जो मित्रवत और करुणामय है, ममता और अहंकार से रहित, सुख-दुःख में समान, और क्षमाशील है —

भगवद्गीता 12.13 कौन बोलता है?

श्रीभगवान्। वक्ता पाठ की अपनी उवाच पंक्ति से लिया गया है, श्लोक-क्रमांक से अनुमानित नहीं।

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