॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
रथ पर से बोलते श्रीकृष्ण और सामने बैठकर सुनते अर्जुन, पीछे मैदान

शब्दावली · दया

दया

दया, और उसके साथ चलने वाली अहिंसा।

दया और करुणा के बारे में भगवद्गीता क्या कहती है?

दया शब्द गीता में एक ही बार आता है, 16.2 में, जहाँ प्राणियों पर दया को, दैवी संपदा के लक्षणों में गिना गया है। करुणा शब्द भी एक ही बार आता है, 12.13 में, जहाँ श्रीकृष्ण को प्रिय भक्त को, मित्रवत और करुणामय कहा गया है। अहिंसा इस ग्रंथ का अधिक सामान्य शब्द है, और गुणों की कई सूचियों में मिलती है। पर यह भाव शब्दावली से कहीं अधिक दूर तक फैला है — समदर्शन में, सब प्राणियों के हित में, दूसरे की पीड़ा को अपनी पीड़ा से नापने में — और वहाँ वह दूसरे शब्दों के नीचे चलता है।

हांसी गीता भवन ट्रस्ट · दया 3 श्लोकों में

पाठ में

दया

dayā

3 श्लोकपहला 10.5

कोई श्लोक तब गिना गया है जब उसके संस्कृत पाठ में वह शब्द आता है, समास सहित। यह जाँचने योग्य तथ्य है और न्यूनतम है, कुल नहीं — गीता वहाँ भी यही सिखाती है जहाँ यह शब्द नहीं आता।

यह लिख देना आसान है कि गीता करुणा का ग्रंथ है, और शब्दों से यह दिखाना कठिन। संस्कृत में खोजिए तो दया एक ही श्लोक में मिलती है, 16.2 में, एक सूची के भीतर। करुणा एक ही श्लोक में मिलती है, 12.13 में, दूसरी सूची के भीतर। अहिंसा अधिक बार आती है — 10.5, 13.7, 16.2, 17.14 — और हर बार किसी विषय के रूप में नहीं, एक गुण के रूप में। करुणा को कोई पूरा अध्याय नहीं दिया गया, जैसा बारहवाँ भक्ति को और छठा मन को दिया गया है। यह ग्रंथ के बारे में एक तथ्य है, और इस पर कुछ खड़ा करने से पहले इसे कह देना उचित है।

गीता इसके बदले यह करती है, कि इस भाव को दूसरी चीज़ों के भीतर रख देती है। 12.4 अव्यक्त की उपासना करने वालों को इंद्रिय-संयमी, सर्वत्र समदृष्टि रखने वाला, और सब प्राणियों के हित में रत बताता है। 6.32 उस योगी को परम कहता है जो सबको अपने ही समान मानकर देखता है और दूसरों के सुख-दुःख को अपना ही समझता है। 5.18 में ज्ञानी विद्या-विनय-सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल — सबको एक ही दृष्टि से देखते हैं। इनमें से कोई श्लोक, करुणा का शब्द नहीं बोलता। पर ये सब बताते हैं कि करुणा कहाँ से आएगी।

ग्रंथ के आरंभ में एक कठिनाई है जिसे छोड़ देना ठीक नहीं। अर्जुन जिस स्थिति में गिरे हैं, संजय उसके लिए शब्द कहते हैं कृपा — वे उससे अभिभूत हैं, आँखें आँसुओं से भरी हैं, और वे शोक में डूबे हैं। श्रीकृष्ण का पहला उत्तर उसी स्थिति को हृदय की तुच्छ दुर्बलता कहता है, और उसे छोड़कर खड़े होने को कहता है। जो कृपा मनुष्य को तोड़ देती है और जिस दया को ग्रंथ आगे दैवी गुणों में गिनता है, उनके बीच का अंतर गीता रुककर नहीं समझाती। पाठक को यह देख लेना चाहिए कि वह नहीं समझाती, न कि कोई सुंदर समाधान थमा दिया जाए जो ग्रंथ ने दिया ही नहीं।

जो कहा जा सकता है वह वही है जो श्लोक कहते हैं। 12.13 में भक्त के पहले लक्षण एक ही साँस में जुड़े हैं: वह किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, और सबके प्रति मित्रवत तथा करुणामय है। द्वेष का अभाव, करुणा से पहले गिनाया गया है। और 13.7 में अहिंसा दम्भ के अभाव तथा क्षमा के बीच खड़ी है, शुद्धता, स्थिरता और आचार्य-सेवा के साथ — अर्थात् आदतों के बीच। इस ग्रंथ में करुणा जहाँ भी आती है, वह उस रूप में आती है जो मनुष्य बन चुका है, न कि उस रूप में जिससे मनुष्य बहक जाता है।

इसका अर्थ यह नहीं है

गीता दया के विरुद्ध है: अर्जुन को अपने स्वजनों पर दया आती है और श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसे छोड़ो और युद्ध करो।

2.1 जिसका वर्णन करता है वह है एक अभिभूत मनुष्य — आँखें आँसुओं से भरी, अंग शिथिल; और 2.3 में श्रीकृष्ण उसी टूटन को नाम देते हैं। वही वक्ता 16.2 में प्राणियों पर दया को दैवी संपदा में गिनाते हैं, और 12.13 में भक्त के बारे में सबसे पहली बात यही कहते हैं, कि वह किसी से द्वेष नहीं रखता। दूसरे अध्याय में प्रश्न उस शोक पर है, जिसने मनुष्य को कर्म से ही रोक दिया है। इन दोनों के बीच रेखा ठीक कहाँ खिंचती है, यह ग्रंथ नहीं बताता।

गीता के अपने शब्दों में

जिन श्लोकों पर यह आधारित है।

संस्कृत और दोनों अनुवाद मूल पाठ हैं। प्रत्येक श्लोक के नीचे की टिप्पणी ट्रस्ट का कारण है कि वह श्लोक यहाँ क्यों है — टिप्पणी से असहमत होकर भी श्लोक पर भरोसा किया जा सकता है।

  1. भगवद्गीता 16.2श्रीभगवान्

    अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
    दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

    अहिंसा, सत्य, क्रोध का न होना, त्याग, शांति, किसी की चुगली न करना, प्राणियों पर दया, विषयों के प्रति लालसा का अभाव, कोमलता, लज्जा और चंचलता का न होना।

    वही एक श्लोक जिसमें दया शब्द आता है। प्राणियों पर दया दैवी संपदा के लक्षणों में है, चुगली न करने और विषय-लालसा के अभाव के बीच।

  2. भगवद्गीता 12.13श्रीभगवान्

    अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
    निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

    वह किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से मुक्त है, सुख-दुःख में समान है, और क्षमाशील है।

    वही एक श्लोक जिसमें करुणा शब्द आता है। भक्त किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता और सबके प्रति मित्रवत तथा करुणामय है — और द्वेष का अभाव पहले गिनाया गया है।

  3. भगवद्गीता 12.4श्रीभगवान्

    संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
    ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥

    अपनी सारी इंद्रियों को वश में रखकर, सब जगह समान दृष्टि रखते हुए और सब प्राणियों के हित में लगे रहकर, वे भी मुझ तक ही पहुँचते हैं।

    शब्द के बिना करुणा। अव्यक्त की उपासना करने वालों को सब प्राणियों के हित में रत बताया गया है, और गीता कहती है कि वे भी वहीं पहुँचते हैं।

  4. भगवद्गीता 13.7श्रीभगवान्

    अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
    आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥

    अभिमान का न होना, दिखावे का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता; आचार्य की सेवा, शुद्धता, स्थिरता और आत्म-संयम;

    अहिंसा भावनाओं में नहीं, आदतों में गिनाई गई है: दम्भ के अभाव और क्षमा के बीच, शुद्धता, स्थिरता तथा आचार्य-सेवा के साथ।

  5. भगवद्गीता 2.1सञ्जय

    तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
    विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥

    करुणा से भरे हुए, आँसुओं से भरी व्याकुल आँखों वाले, शोक में डूबे अर्जुन से मधुसूदन ने ये वचन कहे।

    संजय कहते हैं कि अर्जुन कृपा से अभिभूत हैं, आँखें आँसुओं से भरी और व्याकुल हैं। जिस संकट का उत्तर पूरा ग्रंथ है, वह ऐसे भाव से शुरू होता है जिसकी अधिकांश पाठक प्रशंसा करेंगे।

  6. भगवद्गीता 2.3श्रीभगवान्

    क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
    क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥

    पार्थ, कायरता के वश मत हो। यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़कर खड़े हो जाओ, हे परंतप।

    श्रीकृष्ण का पहला उत्तर अर्जुन की स्थिति को हृदय की तुच्छ दुर्बलता कहता है, और उसे छोड़ने को कहता है। इसे 16.2 के साथ कैसे बैठाया जाए, ग्रंथ यह नहीं बताता।

व्यवहार में

जब कोई इसे जीता है, तब कैसा दिखता है।

6.32 वह कसौटी है जो काम में लाई जा सकती है, और उसके लिए पहले कोई भाव जगाना नहीं पड़ता। काउंटर के उस पार खड़े व्यक्ति से बात करने से पहले — वह क्लर्क हो, रोगी हो, या वह विद्यार्थी जिसने काम नहीं किया — यह पूछ लीजिए कि जहाँ वह खड़ा है, वहाँ से यह सब कैसा दिखता है। जिस योगी को वह श्लोक परम कहता है, उसे कोमल नहीं कहा गया। उसे ऐसा कहा गया है जो ठीक-ठीक नाप लेता है।

12.13 द्वेष के अभाव से शुरू होता है, और यह क्रम संयुक्त परिवार में या दफ़्तर में, गंभीरता से लेने लायक है। किसी एक व्यक्ति के प्रति मन से कटुता निकालना सामान्य सद्भाव से धीमा काम है, और उसका दिखावा करना कहीं कठिन। जिसने 2019 में साले की कही बात का हिसाब रखना छोड़ दिया है, उसने वही किया है जिसे श्लोक सबसे पहले गिनाता है।

16.2 प्राणियों पर दया को उसी सूची में रखता है, जिसमें चुगली न करना भी है। दोनों पास-पास बैठे हैं, और साधारण जीवन में लगभग एक ही कौशल हैं। जो नर्स बगल के बिस्तर पर सुनी बात आगे नहीं कहती, जो दुकानदार किसी ग्राहक के उधार की जानकारी आगे नहीं बढ़ाता — श्लोक उसे भी इसी गुण का अंग गिनता है।

समदर्शन पर ट्रस्ट का लेखन →

साथ चलने वाले शब्द

सामान्य प्रश्न

दया के विषय में।

भगवद्गीता में दया शब्द कितनी बार आया है?

एक बार, 16.2 में, दैवी संपदा के गुणों की सूची में, जहाँ उसका अर्थ है प्राणियों पर करुणा। करुणा शब्द भी एक ही बार आता है, 12.13 में। अहिंसा अधिक बार मिलती है — 10.5, 13.7, 16.2 और 17.14 में। शब्द गिनना सीमित काम है, पर वह जाँचा जा सकता है, और इससे दावा ईमानदार बना रहता है।

क्या अहिंसा और करुणा एक ही हैं?

पूरी तरह नहीं। अहिंसा एक संयम के रूप में कही गई है: हिंसा न करना। 16.2 और 12.13 में करुणा दूसरों के प्रति एक भाव के रूप में कही गई है। 16.2 दोनों को अलग-अलग गिनाता है, जिससे लगता है कि ग्रंथ उन्हें एक नहीं मानता था — उस श्लोक का आरंभ अहिंसा से होता है, और दया कुछ आगे चलकर आती है। व्यवहार में बुरे दिन पर जो टिक जाता है, वह संयम ही है।

क्या गीता पशुओं के प्रति दया की बात करती है?

16.2 का शब्द है भूतेषु दया — प्राणियों पर दया, केवल मनुष्यों पर नहीं, और यह शब्द जीवमात्र को समेटता है। 5.18 यही बात और तीखे ढंग से कहता है: ज्ञानी ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल — सबको एक ही दृष्टि से देखते हैं। वह श्लोक व्यवहार से अधिक देखने के बारे में है, पर जो भूमि वह बनाता है वह मनुष्यों तक सीमित नहीं।

क्या अर्जुन का स्वजनों पर दुखी होना गलत था?

गीता इसे इस तरह नहीं रखती। वह उन्हें अभिभूत बताती है, आँखें आँसुओं से भरी हुई (2.1), और श्रीकृष्ण उस स्थिति को हृदय की दुर्बलता कहते हैं (2.3)। कोई श्लोक यह नहीं कहता कि वह भाव आना ही गलत था; समस्या यह मानी गई है कि उसने उन्हें रोक दिया। जो पाठक स्वयं शोक में हों, वे इस प्रसंग को सावधानी से पढ़ें। यह एक ही मनुष्य से, एक ही क्षण में कहा गया है।

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