॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
दो मार्ग अलग होते — एक भोर और मंदिर की ओर, दूसरा रक्तिम छाया में सँकरा होता

अध्याय 16 · दैवी और आसुरी सम्पदा

भगवद्गीता 16.2

अहिंसा, सत्य, प्राणियों पर दया।

श्रीभगवान्

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

ahiṁsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam / dayā bhūteṣvaloluptvaṁ mārdavaṁ hrīracāpalam

अहिंसा, सत्य, क्रोध का न होना, त्याग, शांति, किसी की चुगली न करना, प्राणियों पर दया, विषयों के प्रति लालसा का अभाव, कोमलता, लज्जा और चंचलता का न होना।

English · Not harming, truthfulness, freedom from anger, letting go, calm, refusing to speak against people, kindness to living beings, no craving for what one sees, gentleness, modesty, and no restlessness.

अर्थ

अहिंसा, सत्य, प्राणियों पर दया।

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शांति, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लोभ का अभाव, कोमलता, लज्जा, अचंचलता — ये दैवी स्वभाव के लक्षण हैं।

यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।

यह श्लोक कहाँ खड़ा है

दैवी संपद्

अध्याय 1616.1–3

अभय, शुद्धि, संयम, सत्य, करुणा और उनसे जुड़े गुण गिनाए जाते हैं।

यह श्लोक आरंभिक कथन को आगे बढ़ाता है।

ट्रस्ट का विषयचरित्र

मेरा बार-बार दोहराया जाने वाला आचरण कौन-सा गुण गढ़ रहा है?

इसे इसके सूत्र के साथ पढ़िए: 12.13–20 · 13.7–11 · 16.1–3 · 17.14–16 · 18.42–44

किन विषयों में

इस श्लोक के शब्द

ये इसलिए दिए गए हैं कि ऊपर के संस्कृत में वह शब्द आता है — यह जाँचने योग्य तथ्य है, व्याख्या नहीं।

समान शब्दावली वाले श्लोक

पाठ के अपने शब्दों में इसके निकट।

  1. 18.53अहङ्कार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को छोड़कर, ममता से रहित और शान्त हुआ मनुष्य ब्रह्म-भाव के योग्य हो जाता है।
  2. 10.5अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश — प्राणियों के ये अलग-अलग भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
  3. 12.13वह किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से मुक्त है, सुख-दुःख में समान है, और क्षमाशील है।
  4. 13.7अभिमान का न होना, दिखावे का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता; आचार्य की सेवा, शुद्धता, स्थिरता और आत्म-संयम;
  5. 17.14देवताओं, द्विजों, गुरुओं और ज्ञानियों का आदर करना, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — इसे शरीर का तप कहा जाता है।
  6. 2.66जो युक्त नहीं है, उसमें न बुद्धि होती है और न चिंतन। चिंतन के बिना शांति नहीं, और शांति के बिना सुख कहाँ?

समान दुर्लभ शब्दों के आधार पर चुने गए, जहाँ दुर्लभ शब्द का भार सामान्य शब्द से कहीं अधिक है। यह पढ़ने में सहायक है, यह दावा नहीं कि इन श्लोकों का अर्थ एक है।

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 16.2 का अर्थ क्या है?

अहिंसा, सत्य, प्राणियों पर दया। अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शांति, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लोभ का अभाव, कोमलता, लज्जा, अचंचलता — ये दैवी स्वभाव के लक्षण हैं।

भगवद्गीता 16.2 कौन बोलता है?

श्रीभगवान्। वक्ता पाठ की अपनी उवाच पंक्ति से लिया गया है, श्लोक-क्रमांक से अनुमानित नहीं।

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