
अध्याय 4 · ज्ञान और कर्म-संन्यास
भगवद्गीता 4.7
जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं आता हूँ।
श्रीभगवान्
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata / abhyutthānamadharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham
जब-जब धर्म क्षीण होता है और अधर्म सिर उठाता है, भारत, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
English · Whenever dharma grows weak and what stands against dharma rises up, Bharata, at that time I send myself forth into the world.
अर्थ
जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं आता हूँ।
हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।
यह श्लोक कहाँ खड़ा है
प्राचीन शिक्षा और अवतार
अध्याय 44.1–9
श्रीकृष्ण इस योग को एक परंपरा में रखते हैं; अर्जुन काल-क्रम पूछते हैं; श्रीकृष्ण अपने प्राकट्य की बात करते हैं।
यह श्लोक प्रसंग के मध्य विकास में आता है।
दिव्य प्राकट्य की चर्चा क्यों
श्रीकृष्ण प्राकट्य की बात तब करते हैं जब धर्म क्षीण होता है और अधर्म उठता है। यह अंश केवल प्रेरणा का नहीं, धर्मशास्त्रीय है: यह ईश्वर का सृष्टि और नैतिक व्यवस्था से संबंध बताता है।
और गहराई में · 4.8–9, 7.24–26, 9.11 और 11.3–8 के साथ पढ़िए।
हांसी गीता भवन ट्रस्ट · द गीता फ़ॉर लाइफ़
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पाठ के अपने शब्दों में इसके निकट।
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समान दुर्लभ शब्दों के आधार पर चुने गए, जहाँ दुर्लभ शब्द का भार सामान्य शब्द से कहीं अधिक है। यह पढ़ने में सहायक है, यह दावा नहीं कि इन श्लोकों का अर्थ एक है।
सामान्य प्रश्न
भगवद्गीता 4.7 का अर्थ क्या है?
जब-जब धर्म की हानि होती है, मैं आता हूँ। हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
भगवद्गीता 4.7 कौन बोलता है?
श्रीभगवान्। वक्ता पाठ की अपनी उवाच पंक्ति से लिया गया है, श्लोक-क्रमांक से अनुमानित नहीं।
