॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ · स्थापना 3 अक्टूबर 1968 · हांसी, हरियाणा
हांसी गीता भवन ट्रस्टहांसी · हरियाणा
रथ पर बैठे श्रीकृष्ण और अर्जुन, सामने नदी-घाटी जहाँ सूर्योदय में लोग हल चला रहे हैं, गाय हाँक रहे हैं, चाक पर घड़े बना रहे हैं और जल ढो रहे हैं

अध्याय 3 · कर्म का योग

भगवद्गीता 3.35

अपना धर्म श्रेष्ठ है, चाहे दोषयुक्त हो।

श्रीभगवान्

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt / svadharme nidhanaṁ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ

अपना स्वधर्म, चाहे अधूरा ही निभे, दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है जो भले ही अच्छी तरह निभाया गया हो। अपने धर्म में मरना भी अच्छा है; पराया धर्म भय लाता है।

English · Your own svadharma, even carried out imperfectly, is better than another’s dharma done well. It is better to die in your own dharma; another’s brings danger.

अर्थ

अपना धर्म श्रेष्ठ है, चाहे दोषयुक्त हो।

अपना धर्म, अपूर्ण रूप से किया हुआ भी, दूसरे के भली-भाँति किए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है; दूसरे का धर्म भयदायक है।

यह ट्रस्ट का अपना पाठ है, इसी वेबसाइट के लिए लिखा गया। ऊपर का श्लोक मूल पाठ है।

यह श्लोक कहाँ खड़ा है

प्रकृति, कर्तृत्व और विवेक

अध्याय 33.27–35

गुण अहंकार के कर्तृत्व-भाव को जटिल बना देते हैं; ज्ञानी उन्हें विचलित न करे जो अभी आसक्त हैं।

यह श्लोक प्रसंग को पूरा करता है और अगले मोड़ की भूमिका बनाता है।

ट्रस्ट का विषयत्रिगुण

इस क्षण कौन-सा गुण प्रबल है — प्रकाश, बेचैन तृष्णा, या जड़ता?

इसे इसके सूत्र के साथ पढ़िए: 3.27–29 · 7.12–14 · 13.19–23 · 14.1–27 · 17.1–22 · 18.19–39

किन विषयों में

इस श्लोक के शब्द

ये इसलिए दिए गए हैं कि ऊपर के संस्कृत में वह शब्द आता है — यह जाँचने योग्य तथ्य है, व्याख्या नहीं।

समान शब्दावली वाले श्लोक

पाठ के अपने शब्दों में इसके निकट।

  1. 18.47दूसरे के भली भाँति किए हुए धर्म से अपना गुणरहित धर्म भी श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से नियत कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
  2. 2.31अपने स्वधर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए। क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर और कुछ नहीं।
  3. 2.33किंतु यदि तुम यह धर्मयुक्त युद्ध नहीं करोगे, तो अपना स्वधर्म और अपनी कीर्ति दोनों छोड़कर पाप को प्राप्त होगे।
  4. 2.40इसमें किया हुआ प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता, और उल्टा परिणाम भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से रक्षा करता है।
  5. 2.35महारथी यही मानेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से हट गए। जिनकी दृष्टि में तुम ऊँचे थे, उन्हीं की दृष्टि में हल्के हो जाओगे।
  6. 2.56जो दुःख में विचलित नहीं होता, सुख में जिसकी चाह नहीं रहती, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है — वही स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहा जाता है।

समान दुर्लभ शब्दों के आधार पर चुने गए, जहाँ दुर्लभ शब्द का भार सामान्य शब्द से कहीं अधिक है। यह पढ़ने में सहायक है, यह दावा नहीं कि इन श्लोकों का अर्थ एक है।

सामान्य प्रश्न

भगवद्गीता 3.35 का अर्थ क्या है?

अपना धर्म श्रेष्ठ है, चाहे दोषयुक्त हो। अपना धर्म, अपूर्ण रूप से किया हुआ भी, दूसरे के भली-भाँति किए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है; दूसरे का धर्म भयदायक है।

भगवद्गीता 3.35 कौन बोलता है?

श्रीभगवान्। वक्ता पाठ की अपनी उवाच पंक्ति से लिया गया है, श्लोक-क्रमांक से अनुमानित नहीं।

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